जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [उस ब्रह्म में] (सनेमि) एकसी पुट्ठीवाला [पहिये का बाहिरी भाग वा चलाने का बल एक सा रखनेवाला], (अजरम्) शीघ्रगामी (चक्रम्) चक्र [चक्रसमान संवत्सर वा काल] (वि) खुला हुआ (ववृते=वर्तते) घूमता है, [उसी ब्रह्म में] (उत्तानायाम्) उत्तमता से फैली हुई [सृष्टि] के भीतर (दश) दस (युक्ताः) जुड़ी हुई [दिशाएँ] (वहन्ति) बहती हैं। [और उसी ब्रह्म में] (सूर्यस्य) सूर्य का (चक्षुः) नेत्र (रजसा) अन्तरिक्ष के साथ (आवृतम्) फैला हुआ (याति) चलता है, (यस्मिन्) जिस [ब्रह्म] के भीतर (विश्वा भुवनानि) सब लोक (आतस्थुः) यथावत् ठहरे हैं ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा में सब लोक समष्टिरूप से स्थित हैं, उसी में काल, दिशाएँ और सूर्य आदि व्यष्टिरूप से वर्तमान हैं ॥१४॥ (यस्मिन्, आतस्थुः) के स्थान पर ऋग्वेद में म० १४ [तस्मिन् आर्पिता] पद हैं ॥