जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतस्य) सत्य [सत्यस्वरूप ब्रह्म] की (जराय) जरा [पुरानापन] करने के लिये (द्याम् परि) आकाश के सब ओर वर्तमान (द्वादशारम्) बारह [महीने रूप] अरेवाला (तत्) वह (चक्रम्) चक्र [संवत्सर अर्थात् काल] (नहि) नहीं (वर्वर्ति) कतरा-कतरा कर घूमता है। (अग्ने) हे विद्वान् ! (अत्र) इस [संवत्सर] में (सप्त शतानि) सात सौ (च) और (विंशतिः) बीस (मिथुनासः) जोड़े-जोड़े (पुत्राः) पुत्र [संवत्सर के पुत्र रूप दिन और रात के जोड़] (आ तस्थुः) भले प्रकार खड़े हुए हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - अनादि अनन्त परमेश्वर को आकाश में सब ओर घूमता हुआ काल वश में नहीं कर सकता, जैसे वह संसार के अन्य पदार्थों को घात लगा लगाकर पकड़ लेता है ॥१३॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में ११ वाँ है ॥ इस मन्त्र का कुछ भाग-निरु० ४।२७। में व्याख्यात है ॥