जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चपादम्) पाँच [पृथिवी आदि पाँच तत्त्वों] में गतिवाले (पितरम्) पालन करनेवाले, (द्वादशाकृतिम्) बारह [पाँच ज्ञानेन्द्रिय−कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका और पाँच कर्मेन्द्रिय−वाक्, हाथ, पाँव, पायु और उपस्थ और दो मन और बुद्धि] को आकार देनेवाले, (पुरीषिणम्) पूर्तिवाले [परमेश्वर] को (दिवः) प्रत्येक व्यवहार की (परे) परम (अर्धे) ऋद्धि [वृद्धि] के बीच (आहुः) वे [ऋषि लोग] बताते हैं। (अथ) और (इमे) यह (अन्ये) दूसरे [विवेकी] (उपरे) उपरति [निवृत्ति, विषयों से वैराग्य] वाले, (सप्तचक्रे) सात [दो कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख-अ० १०।२।६] के द्वारा तृप्त होनेवाले, (षडरे) छह [पूर्वादि चार ऊपर और नीचे की दिशाओं] में गतिवाले (विचक्षणे) विविध देखनेवाले [पण्डित योगी] के भीतर [परमात्मा को] (अर्पितम्) जड़ा हुआ (आहुः) बताते हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - योगी विद्वान् जन परमात्मा को अपने बाहिर और भीतर साक्षात् करके परम आनन्द पाते हैं ॥१२॥ (विचक्षणे) के स्थान पर ऋग्वेद में [विचक्षणम्] पद है ॥