जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पञ्चारे) [पृथिवी आदि पाँच तत्त्व रूप] पाँच अरावाले (परिवर्तमाने) सब ओर घूमते हुए (यस्मिन्) जिस (चक्रे) पहिये पर [पहिये समान जगत् में] (विश्वा) भुवनानि) सब लोक (आतस्थुः) ठहरे हुए हैं। (तस्य) उस [चक्ररूप जगत्] का (भूरिभारः) बड़े बोझवाला (सनाभिः) नाभि में लगा हुआ (अक्षः) धुरा [धुरा रूप परमेश्वर] (सनात् एव) सदा से ही (न तप्यते) न तो तपता है और (न छिद्यते) न टूटता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश पाँच भूतों से निर्मित जगत् में सब लोक स्थित हैं, उस जगत् का स्वामी अजर-अमर परमात्मा है। और जैसे रथ में अधिक बोझ लादने से धुरा तपकर टूट जाता है, वैसे परमेश्वर इस सृष्टि का इतना बोझ अनादि काल से उठाने पर भी क्लेश नहीं पाता ॥११॥ (यस्मिन्, छिद्यते) के स्थान पर [तस्मिन्, शीर्यते] हैं−ऋ० १।१६४।१३ ॥