जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एकः) एक [सर्वव्यापक परमेश्वर] (तिस्रः) तीन [सत्त्व, रज और तमोगुण रूप] (मातॄः) निर्माणशक्तियों और (त्रीन्) तीन [ऊँचे, नीचे और मध्य, अथवा भूत, भविष्यत् और वर्तमान] (पितॄन्) पालन करनेवाले [लोकों वा कालों] को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (ऊर्ध्वः) ऊपर (तस्थौ) स्थित हुआ, (ईम्) इस [परमेश्वर] को वे [ऊपर कहे हुए] (न अव ग्लपयन्त=०−न्ति) कभी नहीं ग्लानि पहुँचाते हैं। (विश्वविदः) जगत् के जाननेवाले लोग (अमुष्य) उस (दिवः) प्रकाशमान [सूर्य] के (पृष्ठे) पीठ [पीठ समान सहारा देनेवाले ब्रह्म] के विषय में (अविश्वविन्नाम्) सब को न मिलनेवाली (वाचम्) वाणी को (मन्त्रयन्ते) मनन करते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - एक परमात्मा ही संसार के सब कालों और सब लोकों का स्वामी, सूर्य आदि का रचनेवाला है, उस परब्रह्म को सृष्टिविद्या जाननेवाले विज्ञानी जानते हैं, सामान्य मनुष्य नहीं ॥१०॥ (ग्लापयन्त, विश्वविदः, अविश्वविन्नाम्) के स्थान पर [ग्लापयन्ति, विश्वविदम्, अविश्वमिन्वाम्] पद हैं−ऋ० १।१६४।१० ॥