जीवात्मा और परमात्मा के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस [जगत्] के (वामस्य) प्रशंसनीय, (पलितस्य) पालनकर्ता, (होतुः) तृप्ति करनेवाले (तस्य) उस [सूर्य] का (मध्यमः) मध्यवर्ती (भ्राता) भ्राता [भाई समान हितकारी] (अश्नः) [व्यापक] बिजुली (अस्ति) है। (अस्य) इस [सूर्य] का (तृतीयः) तीसरा (भ्राता) भ्राता (घृतपृष्ठः) घृतों [प्रकाश करनेवाले घी, काष्ठ आदि] से स्पर्श किया हुआ [पार्थिव अग्नि है], (अत्र) इस [सूर्य] में (सप्तपुत्रम्) सात [इन्द्रियों−त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] को शुद्ध करनेवाले (विश्पतिम्) प्रजाओं के पालनकर्ता [जगदीश्वर] को (अपश्यम्) मैंने देखा है ॥१॥
भावार्थभाषाः - संसार में सूर्य के तेजोरूप अंश बिजुली और अग्नि हैं और तीनों भाई के समान परस्पर भरण करते हैं, जिससे अनेक लोकों की स्थिति है। विज्ञानी पुरुष साक्षात् करते हैं। वह परमात्मा अन्तर्यामी रूप से विराजकर उस सूर्य को भी अपनी शक्ति में रखता है ॥१॥ १−यह मन्त्र निरुक्त ४।२६। में व्याख्यात है ॥ २−मन्त्र १-२२ ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ के मन्त्र १-२२ कहीं-कहीं आगे-पीछे और कुछ पाठभेद से हैं। मन्त्र १-४ ऋग्वेद में १-४ हैं ॥