पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) यदि वह [बलास रोग] (कामात्) इच्छा से [अथवा] (अपकामात्) द्वेष के कारण (हृदयात्) हृदय से (परि) सब ओर (जायते) उत्पन्न होता है, (हृदः) हृदय के (बलासम्) बलास [बल के गिरानेवाले, संनिपात, कफादि रोग] को (अङ्गेभ्यः) अङ्गों से (बहिः) बाहिर... म० ५ ॥८॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: ८−(यदि) सम्भावनायाम् (कामात्) अभिलाषात् (अपकामात्) द्वेषात् (हृदयात्) (जायते) उत्पद्यते (परि) सर्वतः (हृदः) हृदयस्य (बलासम्) अ० ४।९।८। बलमस्यतीति। श्लेष्मविकारम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
