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यः कृ॒णोति॑ प्र॒मोत॑म॒न्धं कृ॒णोति॒ पूरु॑षम्। सर्वं॑ शीर्ष॒र्ण्यं ते॒ रोगं॑ ब॒हिर्निर्म॑न्त्रयामहे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य: । कृणोति । प्रऽमोतम् । अन्धम् । कृणोति । पुरुषम् । सर्वम् । शीर्षण्यम् । ते । रोगम् । बहि: । नि: । मन्त्रयामहे ॥१३.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [रोग] (पुरुषम्) पुरुष को (प्रमोतम्) गूँगा [वा बहिरा] (कृणोति) करता है, [वा] (अन्धम्) अन्धा (कृणोति) करता है। (सर्वम्) सब (ते) तेरे.... म० १ ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: ४−(यः) रोगः (प्रमोतम्) मुट आक्षेपमर्दनयोः-घञ्, टस्य तः। अमोटं कुटिलीकृतं मूकं बधिरं वा (अन्धम्) अन्ध दृष्टिनाशे-अच् चक्षुर्हीनम्। अन्यत् सुगमम् ॥