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यस्य॑ हे॒तोः प्र॒च्यव॑ते॒ यक्ष्मः॑ कर्ण॒त आ॑स्य॒तः। सर्वं॑ शीर्ष॒र्ण्यं ते॒ रोगं॑ ब॒हिर्निर्म॑न्त्रयामहे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य । हेतो: । प्रऽच्यवते । यक्ष्म: । कर्णत: । आस्यत: । सर्वम् । शीर्षण्यम् । ते । रोगम् । बहि: । नि: । मन्त्रयामहे ॥१३.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिस [रोग] के (हेतोः) कारण से (यक्ष्मः) राजरोग [क्षयी आदि] (कर्णतः) कान से और (आस्यतः) मुख से (प्रच्यवते) फैलता है, (सर्वम्) सब (ते) तेरे... म० १ ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: ३−(यस्य) रोगस्य (हेतोः) कमिमनिजनि०। उ० १।७३। हि गतिवृद्ध्योः-तु। कारणात् (प्रच्यवते) विस्तीर्यते (यक्ष्मः) अ० २।१०।५। राजरोगः। अन्यत् सुगमम् ॥