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सं ते॑ शी॒र्ष्णः क॒पाला॑नि॒ हृद॑यस्य च॒ यो वि॒धुः। उ॒द्यन्ना॑दित्य र॒श्मिभिः॑ शी॒र्ष्णो रोग॑मनीनशोऽङ्गभे॒दम॑शीशमः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । ते । शीर्ष्ण: । कपालानि । हृदयस्य । च । य: । विधु: । उत्ऽयन् । आदित्य । रश्मिऽभि: । शीर्ष्ण: । रोगम् । अनीनशम: । अङ्गऽभेदम् । अशीशम: ॥१३.२२॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:22


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे रोगी !] (ते) तेरे (शीर्ष्णः) शिर के (कपालानि) कपाल की हड्डियाँ (सम्) स्वस्थ [होवें], (च) और (हृदयस्य) हृदय की (यः) जो (विधुः) धड़क [है, वह भी ठीक होवे]। (आदित्य) हे सूर्य [समान तेजस्वी वैद्य !] (उद्यन्) उदय होते हुए तूने (रश्मिभिः) [जैसे सूर्य ने अपनी] किरणों से (शीर्ष्णः) शिर के (रोगम्) रोग को (अनीनशः) नाश कर दिया है, और (अङ्गभेदम्) अङ्गों की फूटन को (अशीशमः) तूने शान्त कर दिया है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार का नाश होता है, वैसे ही उत्तम वैद्यों की चिकित्सा से रोगों का निवारण होता है और इसी प्रकार विद्वान् पुरुष आत्मदोष की निवृत्ति करके आत्मोन्नति करता है ॥२२॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: २२−(सम्) सम्यक्। स्वस्थानि (शीर्ष्णः) मस्तकस्य (कपालानि) तमिविशिविडि०। उ० १।११८। कपि चलने-कालन्, नलोपः। शिरोऽस्थीनि (हृदयस्य) (च) (यः) (विधुः) पॄभिदिव्यधि०। उ० १।२३। व्यध ताडने-कु। ग्रहिज्यावयिव्यधि०। पा० ६।१।१६। इति सम्प्रसारणम्। ताडनम् (उद्यन्) उद्गच्छन् (आदित्य) हे सूर्यवत्तेजस्विन् वैद्य (रश्मिभिः) किरणैर्यथा (शीर्ष्णः) मस्तकस्य (रोगम्) (अनीनशः) नाशितवानसि (अङ्गभेदम्) अङ्गानां विदारणम् (अशीशमः) शान्तीकृतवानसि ॥