पादा॑भ्यां ते॒ जानु॑भ्यां॒ श्रोणि॑भ्यां॒ परि॒ भंस॑सः। अनू॑कादर्ष॒णीरु॒ष्णिहा॑भ्यः शी॒र्ष्णो रोग॑मनीनशम् ॥
पद पाठ
पादाभ्याम् । ते । जानुऽभ्याम् । श्रोणिऽभ्याम् । परि । भंसस: । अनूकात् । अर्षणी: । उष्णिहाभ्य: । शीर्ष्ण: । रोगम् । अनीनशम् ॥१३.२१॥
अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:21
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरे (पादाभ्याम्) दोनों पैरों से, (जानुभ्याम्) दोनों जानुओं से, (श्रोणिभ्याम्) दोनों कूल्हों से और (भंससः परि) गुह्य स्थान के चारों ओर से, (अनूकात्) रीढ़ से और (उष्णिहाभ्यः) गुद्दी की नाड़ियों से (अर्षणीः) महापीड़ाओं को और (शीर्ष्णः) शिर के (रोगम्) रोग को (अनीनशम्) मैंने नाश कर दिया है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: २१−(ते) तव (पादाभ्याम्) पद्भ्याम् (जानुभ्याम्) दॄसनिजनि०। उ० १।३। जन जनने, जनी प्रादुर्भावे−ञुण्। जङ्घोपरिभागाभ्याम् (श्रोणिभ्याम्) अ० २।३३।५। नितम्बाभ्याम् (परि) सर्वतः (भंससः) अ० २।३३।५। गुह्यस्थानात् (अनूकात्) अ० ४।१४।८। पृष्ठवंशात् (अर्षणीः) म० १३। महापीडाः (उष्णिहाभ्यः) अ० २।३३।२। ग्रीवानाडीभ्यः (शीर्ष्णः) शिरसः (रोगम्) (अनीनशम्) अ० १।२३।४। नाशितवानस्मि ॥
