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या म॒ज्ज्ञो नि॒र्धय॑न्ति॒ परूं॑षि विरु॒जन्ति॑ च। अहिं॑सन्तीरनाम॒या निर्द्र॑वन्तु ब॒हिर्बिल॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या: । मज्ज्ञ: । नि:ऽधयन्ति । परूंषि । विऽरुजन्ति । च । अहिंसन्ती: । अनामया: । नि: । द्रवन्तु । बहि: । बिलम् ॥१३.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:18


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो [महापीड़ाएँ] (मज्ज्ञः) मज्जाओं [हड्डी की मींगों] को (निर्धयन्ति) चूस लेती हैं (च) और (परूँषि) जोड़ों को (विरुजन्तिः) फोड़ डालती हैं, वे (अहिंसन्तीः) न सताती हुई, (अनामयाः) रोगरहित होकर (बहिः) बाहिर (निः द्रवन्तु) निकल जावें, और (बिलम्) बिल [फूटन रोग भी निकल जावे] ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १८−(याः) अर्षण्यः (मज्ज्ञः) अ० १।११।४। अस्थिमध्यस्थस्नेहान् (निर्धयन्ति) धेट् पाने। नितरां पिबन्ति (परूँषि) ग्रन्थीन्। अन्यत् पूर्ववत्-म० १३ ॥