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या गुदा॑ अनु॒सर्प॑न्त्या॒न्त्राणि॑ मो॒हय॑न्ति च। अहिं॑सन्तीरनाम॒या निर्द्र॑वन्तु ब॒हिर्बिल॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या: । गुदा: । अनुऽसर्पन्ति । आन्त्राणि । मोहयन्ति । च । अहिंसन्ती: । अनामया: । नि: । द्रवन्तु । बहि: । बिलम् ॥१३.१७॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:17


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो [महापीड़ाएँ] (गुदाः) गुदा की नाड़ियों में (अनुसर्पन्ति) रेंगती जाती हैं (च) और (आन्त्राणि) आँतों को (मोहयन्ति) गड़बड़ कर देती हैं, वे (अहिंसन्तीः) न सताती हुई... १३ ॥१७॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १७−(याः) अर्षण्यः (गुदाः) अ० २।३३।४। मलत्यागनाडीः (अनुसर्पन्ति) अनुक्रमेण प्राप्नुवन्ति (आन्त्राणि) अ० ९।७।१६। नाडीविशेषान् (मोहयन्ति) व्याकुलीकुर्वन्ति। अन्यत् पूर्ववत् ॥