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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (अर्षणीः) महापीड़ाएँ (तिरश्चीः) तिरछी होकर (ते) तेरी (वक्षणासु) छाती के अवयवों में (उपर्षन्ति) घुस जाती हैं, वे (अहिंसन्तीः) न सताती हुई... १३ ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १६−(याः) (तिरश्चीः) वक्रगामिन्यः (अर्षणीः) म० १३। महापीडाः (वक्षणासु) अ० ७।११४।१। वक्षःस्थलेषु। अन्यत् पूर्ववत् ॥
