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याः पा॒र्श्वे उ॑प॒र्षन्त्य॑नु॒निक्ष॑न्ति पृ॒ष्टीः। अहिं॑सन्तीरनाम॒या निर्द्र॑वन्तु ब॒हिर्बिल॑म् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या: । पार्श्वे इति । उपऽऋषन्ति । अनुऽनिक्षन्ति । पृष्टी: । अहिंसन्ती: । अनामया: । नि: । द्रवन्तु । बहि: । बिलम् ॥१३.१५॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:15


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो [महापीड़ाएँ] (पार्श्वे) दोनों काँखों में (उपर्षन्ति) घुस जाती हैं और (पृष्टीः) पसलियों को (अनुनिक्षन्ति) चुबा डालती हैं, वे (अहिंसन्तीः) न सताती हुई... १३ ॥१५॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १५−(पार्श्वे) अ० २।३३।३। कक्षयोरधोभागौ (अनुनिक्षन्ति) णिक्ष चुम्बने। निरन्तरं पीडयन्ति (पृष्टीः) अ० २।७।५। पार्श्वस्थीनि। अन्यत् पूर्ववत् ॥