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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो [महापीड़ाएँ] (हृदयम्) हृदय में (उपर्षन्ति) घुस जाती हैं और (कीकसाः) हँसली की हड्डियों में (अनुतन्वन्ति) फैलती जाती हैं, वे (अहिंसन्तीः) न सताती हुई... १३ ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १४−(याः) अर्षण्यः (उपर्षन्ति) ऋषी गतौ। प्रविशन्ति (अनुतन्वन्ति) अनुलक्ष्य विस्तीर्यन्ते (कीकसाः) अ० २।३३।२। जत्रुवक्षोगतास्थीनि। अन्यत् पूर्ववत् ॥
