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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (अर्षणीः) दौड़नेवाली [महापीड़ाएँ] (मूर्धानम् प्रति) मस्तक की ओर [चलकर] (सीमानम्) चाँद [खोपड़ी] को (विरुजन्ति) फोड़ डालती हैं, वे (अहिंसन्तीः) न सताती हुई, (अनामयाः) रोगरहित होकर (बहिः) बाहिर (निः द्रवन्तु) निकल जावें, और (बिलम्) बिल [फूटन रोग भी, निकल जावे] ॥१३॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १३−(याः) (सीमानम्) नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। षिञ् बन्धने-मनिन्। मस्तकभागम्। कपालम् (विरुजन्ति) विदारयन्ति (मूर्धानम्) मस्तकम् (प्रति) प्रतिगत्य (अर्षणीः) सुयुरुवृणो युच्। उ० २।७४। ऋष गतौ-युच्, ङीप्। धावन्त्यः। महापीडाः (अहिंसन्तीः) अनाशयन्त्यः (अनामयाः) रोगरहिताः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
