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आसो॑ ब॒लासो॒ भव॑तु॒ मूत्रं॑ भवत्वा॒मय॑त्। यक्ष्मा॑णां॒ सर्वे॑षां वि॒षं निर॑वोचम॒हं त्वत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आस: । बलास: । भवतु । मूत्रम् । भवतु । आमयत् । यक्ष्माणाम् । सर्वेषाम् । विषम् । नि: । अवोचम् । अहम् । त्वत् ॥१३.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:8» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।

पदार्थान्वयभाषाः - [यदि] (बलासः) बलास [बल का गिरानेवाला सन्निपात, कफ़ादि] (आसः) धनुष [अङ्ग को धनुष समान टेढ़ा करनेवाला] (भवतु) हो जावे, [और उससे] (मूत्रम्) मूत्र (आमयत्) पीड़ा देनेवाला (भवतु) हो जावे। (सर्वेषाम्) सब (यक्ष्माणाम्) क्षयरोगों के (विषम्) विष को (त्वत्) तुझ से (अहम्) मैंने (निः) निकालकर (अवोचम्) बता दिया है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १०−(आसः) असु क्षेपणे-घञ्। धनुः (बलासः) म० ८। श्लेष्मविकारः (भवतु) (मूत्रम्) अ० १।३।६। प्रस्रावः (आमयत्) अम पीडने, चुरादेः-शतृ। पीडयत् (यक्ष्माणाम्) राजरोगाणाम् (सर्वेषाम्) (विषम्) कष्टकरं प्रभावम् (निः) निःसार्य (अवोचम्) कथितवानस्मि (अहम्) वैद्यः (त्वत्) त्वत्सकाशात् ॥