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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समस्त शरीर के रोग नाश का उपदेश। इस सूक्त का मिलान अ० का० २ सूक्त ३३ से करो।
पदार्थान्वयभाषाः - (शीर्षक्तिम्) शिर की पीड़ा, (शीर्षामयम्) शिर की व्यथा (कर्णशूलम्) कर्णशूल [कान की सूजन वा टीस] और (विलोहितम्) बिगड़े लोहू [सूजन आदि] को। (सर्वम्) सब (ते) तेरे (शीर्षण्यम्) शिर के (रोगम्) रोग को (बहिः) बाहिर (निः मन्त्रयामहे) हम विचारपूर्वक निकालते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम वैद्य निदान पूर्व बाहिरी और भीतरी रोगों का नाश करके मनुष्यों को हृष्ट-पुष्ट बनाता है, वैसे ही विद्वान् लोग विचारपूर्वक अविद्या को मिटा कर आनन्दित होते हैं ॥१॥ यही भावार्थ २ से २२ तक अगले मन्त्रों में जानो ॥
टिप्पणी: १−(शीर्षक्तिम्) अ० १।१२।३। शिरःपीडाम् (शीर्षामयम्) शिरोरोगम् (कर्णशूलम्) शूल रोगे-अच्। श्रोत्ररोगम् (विलोहितम्) विकृतरक्तम् (सर्वम्) समस्तम् (शीर्षण्यम्) अ० २।३१।४। शिरसि भवम् (ते) तव (रोगम्) व्याधिम् (बहिः) बहिर्भावे (निः मन्त्रयामहे) मन्त्रा मननात्-निरु० ७।१२। सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। मन ज्ञाने−ष्ट्रन्। मन्त्रो मननम्। ततो नामधातुरूपम्। मननेन निः सारयामः ॥
