पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [सृष्टि में] (मित्रः) प्राणवायु (च) और (वरुणः) अपान वायु (च) ही (अंसौ) दोनों कन्धे, (त्वष्टा) [अन्न जल आदि उत्पन्न करनेवाला] मेघ (च) और (अर्यमा) सूर्य (च) ही (दोषणी) दो भुजदण्ड और (महादेवः=०−वौ) अधिक जीतने की इच्छा और स्तुतिगुण (बाहू) दो भुजाओं [के तुल्य हैं] ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसा शरीर और उसके अवयवों का परस्पर सम्बन्ध है, वैसा ही प्राण आदि का सम्बन्ध सृष्टि से है ॥७॥
टिप्पणी: ७−(मित्रः) प्राणः (च) (वरुणः) अपानः (च) एव (अंसौ) स्कन्धौ (त्वष्टा) अ० ९।६(५)।२। अन्नादीनामुत्पादको मेघः (च) (अर्यमा) अ० ३।१४।२। आदित्यः (दोषणी) दमेर्डोसिः। उ० २।६९। दमु उपशमे−डोसि। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दोषन् आदेशः। नपुंसकाच्च। पा० ७।१।१९। इत्यौङः शी। भुजदण्डौ (महादेवः) दिवु विजिगीषायां स्तुतौ च-अच्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। द्विवचनस्य सुविभक्तिः। महाविजिगीषास्तुतिगुणौ (बाहू) भुजौ ॥
