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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एनम्) उस [पुरुष] को (विश्वरूपाः) सब रूप [वर्ण] वाले और (सर्वरूपाः) सब आकारवाले (पशवः) [व्यक्त वाणी और अव्यक्त वाणीवाले] जीव (उप तिष्ठन्ति) पूजते हैं, (यः) जो (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा की महिमा विचारकर पूर्वोक्त प्रकार से उपासना करके अपनी उन्नति करता है, वह सब प्राणियों का शासक होता है ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(उप तिष्ठन्ति) पूजयन्ति (एनम्) ब्रह्मवादिनम् (विश्वरूपाः) सर्ववर्णाः (सर्वरूपाः) सर्वाकाराः (पशवः) पशवो व्यक्तवाचश्चाव्यक्तवाचश्च-निरु० ११।२९। प्राणिनः (यः) (एवम्) (वेद) जानाति ॥
