वांछित मन्त्र चुनें

ए॒तद्वै वि॒श्वरू॑पं॒ सर्व॑रूपं गोरू॒पम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

एतत् । वै । विश्वऽरूपम् । सर्वऽरूपम् । गोऽरूपम् ॥१२.२५॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:25


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एतद्) व्यापक ब्रह्म (वै) ही (विश्वरूपम्) जगत् का रूप देनेवाला, (सर्वरूपम्) सब का रूप देनेवाला और (गोरूपम्) [प्राप्ति योग्य] स्वर्ग [सुखविशेष] का रूप देनेवाला [है] ॥२५॥
भावार्थभाषाः - सर्वस्रष्टा परमेश्वर प्राणियों को उनके कर्मानुसार सुख देता है ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(एतद्) एतेस्तुट् च। उ० १।१३३। इण् गतौ-अदि, तुट् च। व्यापकं ब्रह्म (वै) हि (विश्वरूपम्) जगतो रूपं यस्मात् तत् (सर्वरूपम्) सर्वरूपकरम् (गोरूपम्) गौः स्वर्गः। (स्वर्गस्य) रूपकरम् ॥