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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [वह] (ईक्षमाणः) देखता हुआ (मित्रः) मित्र [हितकारी], (आवृत्तः) सन्मुख वर्तमान (आनन्दः) आनन्द [स्वरूप है] ॥२३॥
भावार्थभाषाः - सर्वदर्शी सर्वव्यापक परमेश्वर सब का हितकारी है ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(मित्रः) हितः (ईक्षमाणः) पश्यन् सन् (आवृत्तः) समन्ताद् वर्तमानः (आनन्दः) सुखस्वरूपः ॥
