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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [सृष्टि में] (राजा) शासक (सोमः) ऐश्वर्य [अथवा अमृत जल वा चन्द्रमा] (मस्तिष्कः) भेजा [कपाल की चिकनाई], (द्यौः) आकाश (उत्तरहनुः) ऊपर का जबड़ा, (पृथिवी) पृथिवी (अधरहनुः) नीचे का जबड़ा [के तुल्य है] ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे भेजे की शक्ति का प्रभाव मनुष्य के शरीर और विचारों पर रहता है, अथवा जैसे जल और चन्द्रमा अन्न आदि के लिये उपयोगी हैं, वैसे ही चक्राकार सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ में ईश्वरत्व प्रधान गुण है ॥२॥
टिप्पणी: २−(सोमः) अ० १।६।२। षु ऐश्वर्ये-मन्। ऐश्वर्यम् (राजा) शासकः (मस्तिष्कः) मस्त+इष गतौ-क, पृषोदरादित्वात् साधुः। मस्तं मस्तकमिष्यति प्राप्नोतीति। मस्तकभवघृताकारस्नेहः (द्यौः) आकाशः (उत्तरहनुः) उपरिस्थकपोलप्रदेशः (पृथिवी) (अधरहनुः) नीचस्थकपोलभागः ॥
