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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [सृष्टि में] (विश्वव्यचाः) सर्वव्याप्ति (चर्म) चर्म, (ओषधयः) ओषधें [अन्न आदि] (लोमानि) रोम, (नक्षत्राणि) नक्षत्र (रूपम्) रूप [के समान हैं] ॥१५॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १४ के समान है ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(विश्वव्यचाः) व्यच छले सम्बन्धे च-असुन् सर्वव्याप्तिः (चर्म) त्वचा (ओषधयः) अन्नादिपदार्थाः (लोमानि) रोमाणि (नक्षत्राणि) अ० ३।७।७। तारागणाः (रूपम्) सौन्दर्यम् ॥
