0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [सृष्टि में] (नदी) नदी (सूत्री) जन्मदात्री [नाड़ी], (वर्षस्य पतयः) वर्षा के रक्षक [मेघ] (स्तनः) स्तन [दूध के आधार], (स्तनयित्नुः) गर्जन (ऊधः) भेड़ [दूध के छिद्र स्थान के समान है] ॥१४॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि और शरीर के अवयवों का परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट है ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(नदी) सरित् (सूत्री) अमिचिमिशसिभ्यः क्त्रः। उ० ४।१६४। षूङ् प्राणिगर्भविमोचने−क्त्र, ङीप्। उत्पादयित्री नाडी (वर्षस्य पतयः) वृष्टिरक्षका मेघाः (स्तनाः) दुग्धाधाराः (स्तनयित्नुः) अ० ४।१५।११। गर्जनम् (ऊधः) अ० ४।११।४। आपीनम् ॥
