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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [सृष्टि में] (क्षुत्) भूख (कुक्षिः) कोख, (इरा) अन्न (वनिष्ठुः) वनिष्ठु [अन्न रक्त आदि बाँटनेवाली आँत], (पर्वताः) मेघ (प्लाशयः) प्लाशियों [अन्न के आधार आँतों के समान हैं] ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र ७ के समान है ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(क्षुत्) बुभुक्षा (कुक्षिः) उदरपार्श्वः (इरा) अन्नम् (वनिष्ठुः) अ० २।३३।४। अन्नरक्तादिसंभाजकं स्थूलान्त्रम् (पर्वताः) मेघाः-निघ० १।१०। (प्लाशयः) अ० २।३३।४। प्र+अश भोजने−इञ्। रस्य लः। अन्नाधारा अन्त्रविशेषाः ॥
