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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रजापतिः) प्रजापति [प्रजापालक] (च) और (परमेष्ठी) परमेष्ठी [सब से उच्च पदवाला परमेश्वर] (च) निश्चय करके (शृङ्गे) दो प्रधान सामर्थ्य [स्वरूप है], [इसी कारण से सृष्टि में] (इन्द्रः) सूर्य (शिरः) शिर, (अग्निः) [पार्थिव] अग्नि (ललाटम्) माथा, (यमः) वायु (कृकाटम्) कण्ठ की सन्धि [के समान है] ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर में दो प्रधान शक्तियाँ हैं, एक प्रजा अर्थात् सृष्टि की रक्षा और दूसरी परमेष्ठिता अर्थात् सर्वशक्तिमत्ता। इसी से दूरदर्शी जगदीश्वर ने सृष्टि में सूर्य, अग्नि, वायु आदि पदार्थ ऐसे उपयोगी बनाये हैं, जैसे उसने हमारे शरीर में शिर, माथा, गला आदि उपयोगी अङ्ग रचे हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(प्रजापतिः) प्रजापालकः परमेश्वरः (च) समुच्चये (परमेष्ठी) अ० १।७।२। सर्वोत्तमपदस्थः सर्वशक्तिमान् परमात्मा (च) अवधारणे (शृङ्गे) अ० ८।३।२४। द्वे प्राधान्ये (इन्द्रः) सूर्यः (शिरः) मस्तकरूपः (अग्निः) पार्थिवाग्निः (ललाटम्) लल ईप्सायाम्-अच्+अट गतौ-अण्, ललमीप्सामटति ज्ञापयतीति। कपालः (यमः) मध्यस्थानदेवता यमो यच्छतीति सतः-निरु० १०।१९। वायुः (कृकाटम्) कृक+अट गतौ-अण्। कृकं गलमटतीति। कण्ठसन्धिः। कृकाटिका ॥
