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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह [अतिथि जब] (उपहूतः) बुलाया गया (लोकेषु) [दीखते हुए] लोकों में [वर्तमान परस्पर सम्बन्ध को] (भक्षयति) भोगता है, (तस्मिन्) उसको [भोग करने के] उपरान्त (उपहूतः) बुलाया गया वह [गृहस्थ] (लोकेषु) लोकों में (यत्) जो कुछ (विश्वरूपम्) विविध रूप [वस्तु है, उसे भोगता है] ॥११॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ उत्तम विद्वानों द्वारा सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, मङ्गल, बुध, बृहस्पति आदि लोकों के परस्पर सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त करके आत्मोन्नति से महाउपकारी होवे ॥११॥
टिप्पणी: ११−(लोकेषु) दृश्यमानेषु भुवनेषु सूर्यचन्द्रपृथिवीमङ्गलबुधबृहस्पत्यादिलोकेषु वर्तमानं परस्परसम्बन्धम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
