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यत्क्ष॒त्तारं॒ ह्वय॒त्या श्रा॑वयत्ये॒व तत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । क्षत्तारम् । ह्वयति । आ । श्रावयति । एव । तत् ॥११.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:6» मन्त्र:1


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब वह [अतिथि] (क्षत्तारम्) कष्ट से तारनेवाले [धर्मात्मा गृहस्थ] को (ह्वयति) बुलाता है, (तत्) तब वह [अतिथि] (एव) निश्चय करके (आ श्रावयति) आदेश सुनाता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - अतिथि लोग गृहस्थों के पास परोपकार में सहायता के लिये आते हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(यत्) यदा (क्षत्तारम्) अ० ३।२४।७। क्षतः क्षतात् तारकं धर्मात्मानं गृहस्थम् (ह्वयति) आह्वयति (आश्रावयति) आदिशति स्वप्रयोजनम् (एव) (तत्) तदा ॥