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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [जब] वह [गृहस्थ] (अतिथीन् प्रति) अतिथियों की ओर (पश्यति) देखता है, वह [अतिथि] (हिङ्) तृप्ति कर्म (कृणोति) करता है, [जब] वह [गृहस्थ] (अभि वदति) अभिवादन करता है, वह [अपने भाग्य की] (प्र स्तौति) अच्छी भाँति स्तुति करता है, [जब] वह [गृहस्थ] (उदकम्) जल (याचति) विनय करके देता है, (उत् गायति) वह उद्गीथ [वेदगान] करता है। [जब] वह [गृहस्थ, भोजन] (उप हरति) भेंट करता है, (उच्छिष्टम्) अतिशिष्ट [उत्तम] (निधनम्) निधि (प्रति हरति) [अतिथि] प्रत्यक्ष प्राप्त कराता है। [उस गृहस्थ के लिये] (भूत्याः) वैभव का, (प्रजायाः) प्रजा [सन्तान भृत्य आदि] का और (पशूनाम्) पशुओं [गौ, घोड़े, हाथी आदि] का (निधनम्) निधि (भवति) होता है, (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है ॥८, ९, १०॥
भावार्थभाषाः - “अतिथियों शब्द आदरार्थ बहुवचन है। जो गृहस्थ विद्वान् अतिथि का यथावत् सत्कार करता है, वह उसके आशीर्वाद से सब प्रकार उन्नति कर आनन्द भोगता है ॥८, ९, १०॥
टिप्पणी: ८, ९, १०−(अतिथीन्) आदरार्थं बहुवचनम्। अभ्यागतान्। महामान्यान् (प्रति) प्रतीत्य (पश्यति) अवलोकयति (अभि वदति) नमस्करोति (प्र) प्रकर्षेण (स्तौति) आत्मानं प्रशंसति (उदकम्) जलम् (याचति) अ० ९।६(१)।४। ग्रहणार्थं प्रेरयति। विनयेन ददाति (उच्छिष्टम्) उत्+शासु अनुशिष्टौ-क्त। शास इदङ्हलोः। पा० ६।४।३४। इकारः। शासिवसिघसीनां च। पा० ८।३।६०। सस्य षः। अतिशयेन शिष्टं श्रेष्ठम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
