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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) ऐसा (विद्वान्) विद्वान् है, (सः) वह (सर्पिः) घृत (उपसिच्य) सिद्ध करके (उपहरति) भेंट करता है। (यावत्) जितना [फल] (सुसमृद्धेन) बड़ी सम्पत्तिवाले (अतिरात्रेण) अतिरात्र से (इष्ट्वा) यज्ञ करके.... म० १, २ ॥३, ४॥
भावार्थभाषाः - “अतिरात्र जो रात्रि बिताकर सोमयाग वा अन्नेष्टि किया जाता है, जैसे होलिका, दीपावली। आगे ऊपर के समान है-म० १, २ ॥३, ४॥
टिप्पणी: ३, ४−(सर्पिः) अ० १।१५।४। घृतम् (अतिरात्रेण) अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः। पा० ५।४।८७। अच् प्रत्ययः। रात्रिमतीत्य वर्तते स अतिरात्रः। तेन सोमयागविशेषेण। अन्यत् पूर्ववत् ॥
