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याव॑दग्निष्टो॒मेने॒ष्ट्वा सुस॑मृद्धेनावरु॒न्द्धे ताव॑देने॒नाव॑ रुन्द्धे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यावत् । अग्निऽस्तोमेन । इष्ट्वा । सुऽसमृध्देन । अवऽरुन्ध्दे । तावत् । एनेन । अव । रुन्ध्दे॥९.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:4» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) ऐसा (विद्वान्) विद्वान् है, (सः) वह (क्षीरम्) दूध को (उपसिच्य) सिद्ध करके (उपहरति) भेंट करता है। (यावत्) जितना [फल] (सुसमृद्धेन) बड़ी सम्पत्तिवाले (अग्निष्टोमेन) अग्निष्टोम से [जो वसन्तकाल में सोमयाग किया जाता है] (इष्ट्वा) यज्ञ करके (अवरुन्धे) [मनुष्य] पाता है, (तावत्) उतना [फल] (एनेन) इस [कर्म] से (अवरुन्धे) वह [विद्वान्] पाता है ॥१, २॥
भावार्थभाषाः - जैसे विज्ञानी पुरुषों के यज्ञ और संगति करने से वसन्तकाल आदि ऋतु में पुष्ट अन्न उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार विद्वान् संन्यासियों की सेवा से उपदेश पाकर गृहस्थ सदा समृद्ध रहते हैं ॥१, २॥
टिप्पणी: १, २−(सः) गृहस्थः (यः) (एवम्) पूर्वोक्तप्रकारेण (विद्वान्) (क्षीरम्) दुग्धम् (उपसिच्य) संसाध्य (उपहरति) समर्पयति (यावत्) यत्परिमाणं फलम् (अग्निष्टोमेन) अर्त्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। ष्टुञ् स्तुतौ-मन्। अग्नेः स्तुत्स्तोमसोमाः। पा० ८।३।८२। इति षः। वसन्तकाले सोमयागविशेषेण (इष्ट्वा) यज्ञं कृत्वा (सुसमृद्धेन) अतिसम्पत्तियुक्तेन (अवरुन्द्धे) प्राप्नोति (तावत्) (एनेन) पूर्वोक्तकर्मणा (अवरुन्द्धे) प्राप्नोति ॥