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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) वह पुरुष (वै) निश्चय करके (श्रियम्) सेवनीय ऐश्वर्य (च च) और (संविदम्) और यथावत् बुद्धि को (गृहाणाम्) घरों के बीच (अश्नाति) भक्षण [अर्थात् नाश] करता है, (यः) जो (अतिथेः पूर्वः) अतिथि से पहिले (अश्नाति) खाता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग अतिथि का तिरस्कार करने से महाविपत्तियों में फँसते हैं ॥२-६॥
टिप्पणी: ६−(श्रियम्) सेवनीयां सम्पत्तिम् (संविदम्) अ० ३।५।५। यथार्थ बुद्धिम्। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥
