पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) वह [गृहस्थ] (वै) निश्चय करके (ऊर्जाम्) पराक्रम (च च) और (स्फातिम्) वृद्धि को... म० १ ॥३॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग अतिथि का तिरस्कार करने से महाविपत्तियों में फँसते हैं ॥२-६॥
टिप्पणी: ३−(ऊर्जाम्) पराक्रमम् (स्फातिम्) वृद्धिम् ॥
