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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) वह [गृहस्थ] (वै) निश्चय करके (इष्टम्) इष्ट सुख [यज्ञ, वेदाध्ययन आदि] (च च) और (पूर्तम्) अन्नदान आदि को (गृहाणाम्) घरों के बीच (अश्नाति) भक्षण [अर्थात् नाश] करता है, (यः) जो (अतिथेः पूर्वः) अतिथि से पहिले (अश्नाति) खाता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थों को उचित है कि अपने सुखवृद्धि के लिये उपस्थित अतिथियों को जिमाकर आप जीमें ॥१॥ यह मन्त्र स्वामिदयानन्दकृत संस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥
टिप्पणी: १−(इष्टम्) अ० २।१२।४। अभीष्टं सुखं यज्ञवेदाध्ययनादिकम् (च) (वै) (एषः) गृहस्थः (पूर्तम्) अ० २।१२।४। अन्नदानादिकम् (च) (गृहाणाम्) तेषां मध्ये (अश्नाति) भक्षयति। नाशयति (यः) गृहस्थः (पूर्वः) प्रथमः सन् (अतिथेः) महामान्यात् (अश्नाति) खादति ॥
