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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सर्वः) प्रत्येक (एषः वै) वही गृहस्थ (जग्धपाप्मा) भक्षण [नाश] किये हुए पापवाला [होता है] (यस्य अन्नम्) जिसका अन्न (अश्नन्ति) वे [महामान्य] खाते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - अतिथि संन्यासी भोजन करके गृहस्थ को उत्तम उपदेश देकर दुःखों से छुड़ाते हैं, इस से गृहस्थ भोजनदान करके संन्यासियों से शिक्षा लेकर सुखी होवें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(सर्वः) प्रत्येकः (वै) एव (एषः) गृहस्थः (जग्धपाप्मा) अद भक्षणे-क्त। अदो जग्धिर्ल्यप्ति किति। पा० २।४।३६। जग्धादेशः। नामन्सीमन्व्योमन्। उ० ४।१५१। पा रक्षणे, पा पाने वा-मनिन् धातोः पुक्। भक्षितं नाशितं पापं येन (यस्य) गृहस्थस्य (अन्नम्) (अश्नन्ति) खादन्ति ॥
