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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अतिथिः) अतिथि [संन्यासी] (स्रुचा) स्रुचा [चमचा रूप] (हस्तेन) हाथ से (यूपे) जयस्तम्भरूप (प्राणे) प्राण पर (स्रुक्कारेण) स्रुचा की क्रिया से और (वषट्कारेण) आहुति की क्रिया से [जैसे हो वैसे] (आत्मन्) परमात्मा में (तेषाम्) उन (आसन्नानाम्) समीप रक्खी हुई [हवनद्रव्यों] की (जुहोति) [मानो] आहुतियाँ देता है ॥४, ५॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी उपदेश करता है कि जिस प्रकार हवन करके वायु आदि की शुद्धि से उपकार किया जाता है, वैसे ही मनुष्य परमात्मा की आज्ञा में आत्मदान से आत्मा की उन्नति करके अधिक-अधिक उपकार करें ॥४, ५॥ म० ४, ५ और ६ स्वामिदयानन्दकृत संस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥
टिप्पणी: ४, ५−(तेषाम्) हविषाम्-म० ३ (आसन्नानाम्) समीपस्थानाम् (अतिथिः) अभ्यागतः। संन्यासी (आत्मन्) परमात्मनि (जुहोति) आहुतीः करोति (स्रुचा) यज्ञपात्रभेदेन यथा (हस्तेन) (प्राणे) जीवने (यूपे) कुयुभ्यां च। उ० ३।२७। यु मिश्रणामिश्रणयोः-प प्रत्ययः कित् दीर्घश्च। यज्ञस्तम्भे जयस्तम्भे (स्रुक्कारेण) करोतेर्घञ्। स्रुचाक्रियया (वषट्कारेण) अ० १।११।१। आहुतिक्रियया ॥
