वांछित मन्त्र चुनें

प्र॒जाप॑ते॒र्वा ए॒ष वि॑क्र॒मान॑नु॒विक्र॑मते॒ य उ॑प॒हर॑ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रजाऽपते: । वै । एष: । विऽक्रमान् । अनुऽविक्रमते । य: । उपऽहरति ॥७.१२॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:2» मन्त्र:12


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः वै) वही [गृहस्थ] (प्रजापतेः) प्रजापति [प्रजापालक परमेश्वर वा मनुष्य] के (विक्रमान्) विक्रमों [पराक्रमों] का (अनुविक्रमते) अनुकरण करके विक्रम करता है, (यः) जो [अन्न] (उपहरति) भेंट करता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अतिथि विद्वानों की सेवा करनेवाला मनुष्य पुरुषार्थी होकर महापराक्रमी होता है ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(प्रजापतेः) प्रजापालकस्य परमेश्वरस्य मनुष्यस्य वा (वै) (एषः) गृहस्थः (विक्रमान्) पराक्रमान् (अनुविक्रमते) अनुसृत्य पराक्रमान् करोति। अन्यत् पूर्ववत् ॥