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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषः वै) वही [गृहस्थ] (प्रजापतेः) प्रजापति [प्रजापालक परमेश्वर वा मनुष्य] के (विक्रमान्) विक्रमों [पराक्रमों] का (अनुविक्रमते) अनुकरण करके विक्रम करता है, (यः) जो [अन्न] (उपहरति) भेंट करता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अतिथि विद्वानों की सेवा करनेवाला मनुष्य पुरुषार्थी होकर महापराक्रमी होता है ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(प्रजापतेः) प्रजापालकस्य परमेश्वरस्य मनुष्यस्य वा (वै) (एषः) गृहस्थः (विक्रमान्) पराक्रमान् (अनुविक्रमते) अनुसृत्य पराक्रमान् करोति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
