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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एतस्य) उस [गृहस्थ] का (एव) ही (प्राजापत्यः) प्रजापति परमात्मा की प्राप्ति करानेवाला [और प्रजापालक गृहस्थ का हितकारी] (यज्ञः) यज्ञ (विततः) विस्तृत [होता है], (यः) जो [अन्न] (उपहरति) दान करता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - अतिथियों का सत्कारी गृहस्थ संसार में कीर्तिमान् होता है ॥११॥ यह और आगे के दोनों मन्त्र स्वामी दयानन्दकृत संस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥
टिप्पणी: ११−(प्राजापत्यः) अ० ३।२३।५। प्रजापति-ण्य। प्रजापतेः परमात्मनः प्राप्तिकारको यद्वा गृहस्थस्य हितकारकः (वै) (एतस्य) गृहस्थस्य (यज्ञः) शुभव्यवहारः (विततः) विस्तृतः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
