वांछित मन्त्र चुनें

स॑र्व॒दा वा ए॒ष यु॒क्तग्रा॑वा॒र्द्रप॑वित्रो॒ वित॑ताध्वर॒ आहृ॑तयज्ञक्रतु॒र्य उ॑प॒हर॑ति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सर्वदा । वै । एष: । युक्तऽग्रावा । आर्द्रऽपवित्र: । विततऽअध्वर: । आहृतऽयज्ञक्रतु: । य: । उपऽहरति ॥७.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:2» मन्त्र:10


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः वै) वही मनुष्य (सर्वदा) सर्वदा (युक्तग्रावा) सिल-बट्टे ठीक किये हुए, (आर्द्रपवित्रः) [दूध-घी छानने से] भीगे छन्नेवाला, (वितताध्वरः) विस्तृत यज्ञवाला और (आहृतयज्ञक्रतुः) स्वीकार किये हुए यज्ञ कर्मवाला [होता है], (यः) जो [अन्न] (उपहरति) भेंट करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - अतिथियों को भोजन देने और उनसे शिक्षा ग्रहण करने से गृहस्थों का भण्डार आवश्यक पदार्थों से सदा भरा रहता है ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(सर्वदा) नित्यम् (एषः) गृहस्थः (युक्तग्रावा) संगृहीतपेषणपाषाणः (आर्द्रपवित्रः) क्लिन्नशोधनपात्रः (वितताध्वरः) विस्तृतयज्ञः (आहृतयज्ञक्रतुः) क्रतुः कर्मनाम-निघ० २।१। स्वीकृतयज्ञकर्मा (उपहरति) उपहारेण भोजनं ददाति ॥