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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एषः वै) वही मनुष्य (सर्वदा) सर्वदा (युक्तग्रावा) सिल-बट्टे ठीक किये हुए, (आर्द्रपवित्रः) [दूध-घी छानने से] भीगे छन्नेवाला, (वितताध्वरः) विस्तृत यज्ञवाला और (आहृतयज्ञक्रतुः) स्वीकार किये हुए यज्ञ कर्मवाला [होता है], (यः) जो [अन्न] (उपहरति) भेंट करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - अतिथियों को भोजन देने और उनसे शिक्षा ग्रहण करने से गृहस्थों का भण्डार आवश्यक पदार्थों से सदा भरा रहता है ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(सर्वदा) नित्यम् (एषः) गृहस्थः (युक्तग्रावा) संगृहीतपेषणपाषाणः (आर्द्रपवित्रः) क्लिन्नशोधनपात्रः (वितताध्वरः) विस्तृतयज्ञः (आहृतयज्ञक्रतुः) क्रतुः कर्मनाम-निघ० २।१। स्वीकृतयज्ञकर्मा (उपहरति) उपहारेण भोजनं ददाति ॥
