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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अतिथिपतिः) अतिथियों का पालन करनेहारा [गृहपति] (यजमानब्राह्मणम्) यजमान के लिये [अपने लिये] ब्राह्मण [वेदवेत्ता संन्यासी] को (वै) निश्चय करके (एतत्) इस प्रकार (कुरुते) अपने लिये बनाता है, (यत्) जब वह [गृहस्थ] (आहार्याणि) स्वीकार करने योग्य कर्मों को (प्रेक्षते) निहारता है,(इदम्) यह [ब्रह्म] (भूयाः३) और अधिक है [वा] (इदा३म्) यही, (इति) बस ॥१॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मजिज्ञासु ब्रह्मज्ञानी संन्यासी से प्रश्नोत्तर करके ब्रह्मज्ञान प्राप्त करे ॥१॥
टिप्पणी: १−(यजमानब्राह्मणम्) यजमानाय ब्रह्मज्ञानिनम् (वै) निश्चयेन (एतत्) एवम् (अतिथिपतिः) अतिथीनां पालकः (कुरुते) स्वहिताय स्वीकुरुते (यत्) यदा (आहार्याणि) स्वीकरणीयानि कर्माणि (इदम्) सर्वव्यापकं ब्रह्म (भूया ३) प्लुतयोगः। बहु−ईयसुन्। बहुतरम् (इदा३म्) इदं ब्रह्म (इति) वाक्यसमाप्तौ ॥
