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यदु॑पस्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॒व तत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । उपऽस्तृणन्ति । बर्हि: । एव । तत् ॥६.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:1» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो कुछ वे [गृहस्थ] (उपस्तृणन्ति) बिछोना करते हैं, (तत्) वह [संन्यासी के लिये] (बर्हिः) कुशासन (एव) ही होता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी लोग अल्पमूल्य वस्तुओं में निर्वाह करके यज्ञसामग्री का ध्यान रखते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(यत्) यत्किंचित् (उपस्तृणन्ति) आच्छादनानि कुर्वन्ति (बर्हिः) अ० ५।२२।१। कुशासनम्। यज्ञसामग्री ॥