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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब वे [गृहस्थ लोग] (आवसथान्) निवासस्थानों को (कल्पयन्ति) बनाते हैं, (तत्) तब वे [अतिथि लोग] (सदोहविर्धानानि) यज्ञशाला और हवि [लेने-देने योग्य कर्मों] के स्थानों को (एव) ही (कल्पयन्ति) विचारते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थों के बनाये स्थानों में संन्यासी महात्मा विद्यालय, अद्भुतालय, बिजुली, तार आदि स्थानों का विचार करते हैं ॥७॥
टिप्पणी: ७−(यत्) यदा (आवसथान्) उपसर्गे वसेः। उ० ३।११६। आ+वस निवासे-अथ। निवासान् (कल्पयन्ति) रचयन्ति (सदोहविर्धानानि) यज्ञगृहग्राह्यदातव्यकर्मस्थानानि (एव) (तत्) तदा (कल्पयन्ति) विचारयन्ति। समर्थयन्ति ॥
