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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (एव) ही (आपः) जल (यज्ञे) यज्ञ में (प्रणीयन्ते) आदर से लाये जाते हैं, (ताः) वे (एव) ही (ताः) वे [अतिथि के लिये उपकारी होते हैं] ॥५॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी लोग उपकार दृष्टि से ही जल पान आदि करते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(याः) (एव) (यज्ञे) सत्करणीये व्यवहारे (आपः) जलानि (प्रणीयन्ते) आदरेण दीयन्ते (ताः) जलानि (एव) (ताः) उपकारिण्य इत्यर्थः ॥
