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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब वह [गृहस्थ] (अभिवदति) अभिवादन करता है, वह (दीक्षाम्) दीक्षा [व्रत का उपदेश] (उप एति) आदरपूर्वक पाता है, (यत्) जब (उदकम्) जल को वह [गृहस्थ] (याचति) विनय करके देता है, वह [गृहस्थ] (अपः) जल (प्र णयति) [प्रणीता पात्र में] सन्मुख लाता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग आदरपूर्वक अभिवादन आदि करके और पाद्य, अर्घ्य और पानीय जल आदि समर्पण करके अतिथियों से उत्तम शिक्षा ग्रहण करें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(यत्) यदा (अभिवदति) संवदति प्रणमति वा (दीक्षाम्) अ० ८।५।१५। व्रतोपदेशम् (उपैति) आदरेण प्राप्नोति (यत्) यदा (याचति) याचृ आत्मने दानार्थं प्रेरणे, ग्रहणार्थं प्रेरणेऽपि-शब्दकल्पद्रुमः। विनयेन ददाति। (अपः) जलानि (प्र णयति) प्रणीतापात्रेण समर्पयति गृहस्थः ॥
