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यद्वा अति॑थिपति॒रति॑थीन्प्रति॒पश्य॑ति देव॒यज॑नं॒ प्रेक्ष॑ते ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । वै । अतिथिऽपति: । अतिथीन् । प्रतिऽपश्यति । देवऽयजनम् । प्र । ईक्षते ॥६.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:1» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यत् वै) जब ही (अतिथिपतिः) अतिथियों का पालन करनेहारा (अतिथीन्) अतिथियों [नित्य मिलने योग्य विद्वानों] को (प्रति-पश्यति) प्रतीक्षा से देखता है, वह (देवयजनम्) उत्तम गुणों का संगतिकरण (प्र ईक्षते) अच्छे प्रकार देखता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग प्रीति से महामान्य विद्वानों का सत्कार करके उत्तम गुण प्राप्त करते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यत्) यदा (वै) निश्चयेन (अतिथिपतिः) अतिथीनां पालकः (अतिथीन्) अ० ७।२१।१। अत सातत्यगमने−इथिन्। नित्यप्रापणीयान् महामान्यान्। विदुषः पुरुषान् (प्रतिपश्यति) प्रतीक्षया पश्यति (देवयजनम्) उत्तमगुणानां संगतिकरणम् (प्र) प्रकर्षेण (ईक्षते) अवलोकयति ॥