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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शूर्पम्) सूप [छाज], (पवित्रम्) चालनी, (तुषाः) बुसी (ऋजीषा) सोम का फोक [नीरस वस्तु], (अभिसवनीः) मार्जन वा स्नान के पात्र, (आपः) [यज्ञ का] जल। (स्रुक्) स्रुचा [घी चढ़ाने का पात्र], (दर्विः) चमचा, (नेक्षणम्) शूल, शलाका आदि, (आयवनम्) कढ़ाही, (द्रोणकलशाः) द्रोणकलश [यज्ञ के कलश], (कुम्भ्यः) कुम्भी [गर्गरी], (वायव्यानि) पवन करने के (पात्राणि) पात्र [गृहस्थों के हैं], (इयम्) यह [पृथिवी] (एव) ही [संन्यासियों को] (कृष्णाजिनम्) कृष्णसार हरिन की मृगछाला [के समान है] ॥१६, १७॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग अनेक प्रकार की सामग्री से यज्ञ आदि काम करते हैं, सन्यासी पुरुष जितेन्द्रिय होकर समस्त पृथिवी को अपना सर्वस्व और विस्तर आदि समझ प्रसन्न रहते हैं ॥१६, १७॥ मनुस्मृति-अ० ६। श्लो० ४३ में इस प्रकार वर्णन है ॥ अनग्निरनिकेतः स्याद् ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्। उपेक्षकोऽशङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः ॥१॥ (उपेक्षकः) [बुरे कर्मों की] उपेक्षा करनेवाला, (अशङ्कुसुकः) स्थिरबुद्धि, (भावसमाहितः) परमेश्वर की भावना में ध्यान लगाये हुए (मुनिः) मुनि अर्थात् संन्यासी (अनग्निः) आहवनीय आदि अग्नियों से रहित और (अनिकेतः) विना घरवाला (स्यात्) रहे और (अन्नार्थम्) अन्न के लिये (ग्रामम् आश्रयेत्) ग्राम का आश्रम ले ॥
टिप्पणी: १६, १७−(शूर्पम्) सुशॄभ्यां निच्च। उ० ३।२६। शॄ हिंसायाम्-प प्रत्ययः, नित् किच् च, यद्वा शूर्प माने-घञ्। शूर्पमशनपवनं शृणातेर्वा-निरु० ६।९। धान्यस्फोटनयन्त्रम् (पवित्रम्) पुवः संज्ञायाम्। पा० ३।२।१८५। पूञ्, शोधने−इत्र। चालनी (तुषाः) तुष प्रीतौ-क, टाप्। धान्यत्वचः (ऋजीषा) अर्जेर्ऋज च। उ० २८। अर्ज अर्जने−ईषन्, कित्, ऋजादेशः, टाप्। यत्सोमस्य पूयमानस्यातिरिच्यते तदृजीषमपार्जितं भवति-निरु० ५।१२। नीरसं सोमचूर्णम् (अभिसवनीः) अभि+षुञ् स्नपने स्नाने च-ल्युट्, ङीप्। मार्जन्यः। प्रोक्षण्यः (आपः) यज्ञजलानि (स्रुक्) चिक् च। उ० २।६२। स्रु गतौ चिक्। वटपत्राकृतिर्यज्ञपात्रभेदः (दर्विः) अ० ४।१४।१। काष्ठादिचमसः (नेक्षणम्) णिक्ष चुम्बने-ल्युट्। शूलशलाकादिद्रव्यम् (आयवनम्) यु मिश्रणामिश्रणयोः-ल्युट्। पाकसाधनपात्रम्। कटाहः (द्रोणकलशाः) यज्ञघटाः (कुम्भ्यः) उखाः (वायव्यानि) वाय्वृतुपित्रुषसो यत्। पा० ४।२।३१। वायु-यत्। वायुदेवताकानि। वायुसाधकानि (पात्राणि) पा रक्षणे ष्ट्रन्। भाजनानि। यन्त्राणि (इयम्) प्रसिद्धा भूमिः (एव) (कृष्णाजिनम्) कृष्णसारमृगचर्मवत् ॥
