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ये व्री॒हयो॒ यवा॑ निरु॒प्यन्तें॒ऽशव॑ ए॒व ते ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ये । व्रीहय: । यवा: । नि:ऽउप्यन्ते । अंशव: । एव । ते ॥६.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:9» सूक्त:6» पर्यायः:1» मन्त्र:14


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (व्रीहयः) चावल और (यवाः) जौ [गृहस्थों करके] (निरुप्यन्ते) फैलाये [परोसे] जाते हैं, (ते) वे (एव) ही [संन्यासी को] (अंशवः) सूक्ष्म विचार [होते हैं] ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जब गृहस्थ लोग चावल जौ आदि बोकर भोजन करते हैं, संन्यासी लोग स्वयंसिद्ध मुनि अन्नों से निर्वाह करके सूक्ष्म विचार करते हैं ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(ये) (व्रीहयः) अ० ६।१४०।२। धान्यविशेषाः (यवाः) (निरुप्यन्ते) डुवप बीजसन्ताने मुण्डने च। प्रक्षिप्यन्ते (अंशवः) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। अंश विभाजने-क। सूक्ष्मांशाः। सोमलतावयवाः ॥