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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब वे [गृहस्थ लोग] (पुरा) पहिले (परिवेषात्) परोसकर (खादम्) भोजन को (आहरन्ति) खाते हैं। [तब संन्यासी के लिये] (तौ) वे (पुरोडाशौ) दो पुरोडाश [मुनि अन्न की दो रोटियाँ] (एव) ही हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - संन्यासी लोग बहुमूल्य आहारों को छोड़कर थोड़े मुनि अन्न, नीवार, कन्द आदि का भोजन करते हैं ॥१२॥ पुरोडाश का वर्णन मनु० अ० ६। श्लो० ११ में इस प्रकार है ॥ वासन्तशारदैर्मेध्यैर्मुन्यन्नैः स्वयमाहृतैः। पुरोडाशांश्चरूँश्चैव विधिवन्निर्वपेत्पृथक् ॥१॥ अपने हाथ से लाये हुए वसन्त और शरद् में उत्पन्न हुए पवित्र मुनियों के अन्नों से पुरोडाश और चरु को विधि के अनुसार अलग-अलग फैलावे [परोसे] ॥
टिप्पणी: १२−(यत्) यदा (पुरा) आदौ (परिवेषात्) परि+विष्लृ व्याप्तौ-घञ्। पञ्चमीविधाने ल्यब्लोपे कर्मण्युपसंख्यानम्। वा० पा० २।३।२८। ल्यब्लोपे कर्मणि पञ्चमी। परिवेषं भोजनार्थं पात्रे अन्नादेर्दानं समाप्य (खादम्) भोजनम् (आहरन्ति) खादन्ति (पुरोडाशौ) अ० ८।८।२२। मुन्यन्नरोटिकाविशेषौ-मनुः ६।११। (तौ) ॥
